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अमरीका मिडटर्म चुनाव: डेमोक्रैट्स ने सीनेट में हासिल किया बहुमत, 51 सीटों के साथ उच्च सदन पर जमाया कब्जा

वाशिंगटन: अमरीकी मध्यवादि (मिडटर्म) चुनावों के नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने ऐतिहासिक सफलता हासिल करते हुए अमरीकी संसद के उच्च सदन (सीनेट) पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया है। हालिया जीत के साथ डेमोक्रैट्स ने 100 सदस्यीय सीनेट में 51 सीटों का बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है।

पारंपरिक रिपब्लिकन राज्यों में डेमोक्रैट्स की बड़ी सेंध

इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने रिपब्लिकन पार्टी के गढ़ माने जाने वाले कई राज्यों में अप्रत्याशित जीत दर्ज की है:

  • साउथ कैरोलिना: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार और डॉक्टर एनी एंड्रयूज ने रिपब्लिकन डार्लिन ग्राहम को हराकर सीनेट सीट पर कब्जा जमाया। साउथ कैरोलिना में 1998 के बाद पहली बार किसी डेमोक्रेट उम्मीदवार ने सीनेट चुनाव जीता है।

  • नॉर्थ कैरोलिना: राज्य के पूर्व गवर्नर और डेमोक्रेटिक प्रत्याशी रॉय कूपर ने रिपब्लिकन माइकल व्हैटली को मात देकर अपनी पार्टी की झोली में एक और सीट डाली।

  • टेक्सास: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स टैलारिको ने राज्य के अटॉर्नी जनरल और रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन को हराया। टेक्सास में 1994 के बाद से डेमोक्रैट्स की यह पहली राज्यव्यापी जीत है।

  • ओहायो: डेमोक्रेट शेरॉड ब्राउन ने मौजूदा रिपब्लिकन सेनेटर जॉन हस्टेड को मात दी।

  • कैनसस: डेमोक्रेटिक पादरी एडम हैमिल्टन ने मौजूदा रिपब्लिकन सेनेटर रोजर मार्शल को हराकर चौंकाने वाली जीत हासिल की।

डोनाल्ड ट्रंप का बयान

चुनाव नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर वे खुद चुनाव मैदान में (बैलेट पर) होते, तो रिपब्लिकन पार्टी को प्रचंड जीत मिलती। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि वे इस चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे और उनका मानना है कि यदि उनका नाम बैलेट पर होता तो चुनावी नतीजे बिल्कुल अलग होते।

चुनाव का दायरा और आगे का असर

इस चुनाव में अमरीकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) की सभी 435 सीटों, सीनेट की 100 में से 35 सीटों और 36 राज्यों के गवर्नर पदों के लिए मतदान हुआ था।

सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के इस बहुमत का असर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शेष कार्यकाल पर गहराई से पड़ेगा। इससे संसद के कामकाज, सरकारी नीतियों और ट्रंप प्रशासन के विधायी एजेंडे को पारित कराने की राह में बड़ी चुनौतियां आ सकती हैं।

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